Sunday, 26 July 2020

कॉलेज छात्रों को प्रमोट करने की प्रक्रिया में मुख्य सीमाएं

नमस्कार दोस्तों
जैसा की आप सभी को पता है इस समय ना केवल भारतवर्ष अपितु संपूर्ण विश्व कोरोना के कहर की चपेट में है तथा जीवन थम सा गया है इसी क्रम में मार्च में भारत में चल रही सभी परीक्षाओं को स्थगित कर दिया गया था जिसके बाद मई से लेकर अब तक निरंतर सरकारें विश्विद्यााल के छात्रों की परीक्षाएं करवाने के संबंध में दुविधा में है।  एक और जहां विद्यार्थियों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए परीक्षाओं का आयोजन करना अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण है वहीं दूसरी ओर विद्यार्थियों को बिना परीक्षा के अगली कक्षा में उत्तीर्ण करना विभिन्न सीमाओं को धारण किए हुए हैं। निश्चित रूप से हम यह चाहते हैं की विद्यार्थियों की सुरक्षा के हित में उन्हें प्रमोट किया जाए लेकिन निम्न सीमाओं पर ध्यान देने की विशेष आवश्यकता है-
1) राजस्थान जैसे राज्य में जहां कक्षा 10 में अध्ययनरत 14 से 15 वर्षीय औसतन आयु वर्ग के बच्चों की परीक्षाएं संपन्न करवाई गई उस समय परीक्षाओं को लेकर इतना विरोध नहीं हुआ क्योंकि बच्चे अभी छोटे हैं और उनके साथ कोई राजनीति करने वाला ग्रुप नहीं था, कॉलेज में आकर बात कुछ अलग है एक और जहां छात्र नेताओं को अपना वोट बैंक तैयार करना है तो दूसरी और सरकारें भी विद्यार्थियों को प्रमोट ना करके आगामी चुनाव में अपने बोरी बिस्तर बांधना नहीं चाहती।
फिर सवाल ये उठता है कि उन नौनिहालों के भविष्य के बारे में क्या किसी भी मानवता के शुभचिंतक को चिंता नहीं थी ?हालांकि इस संबंध में कुछ विरोध हुआ था लेकिन इतने यत्न किसी ने नहीं किया।
2) यूजीसी के दिशा निर्देशानुसार प्रथम वर्ष के विद्यार्थियों के अंक शत प्रतिशत आंतरिक मूल्यांकन के आधार पर निर्धारित किए जाएंगे साथ ही द्वितीय वर्ष के विद्यार्थियों के अंक 50% आंतरिक मूल्यांकन के आधार पर तथा 50% गत वर्ष के परीक्षा परिणाम के आधार पर निर्धारित किए जाएंगे तब दो महत्वपूर्ण प्रश्न चिह्न है-
A) क्या शत प्रतिशत आंतरिक मूल्यांकन के आधार पर निर्धारण करना शिक्षकों की आत्मनिष्ठता के प्रकोप से बचा हुआ रह सकता है और क्या यह विश्वविद्यालय की मेरिट की सूची में शीर्ष पर आने वाले विद्यार्थियों के लिए बेमानी नहीं होगी जिनको प्रत्येक महाविद्यालय अपने-अपने रिजल्ट के लिए उच्चतम अंक देने की कोशिश करेगा? 
B) आमतौर पर विश्वविद्यालय की परीक्षाओं के परिणामों से बहुत से विद्यार्थी असंतुष्ट नजर आते हैं तथा कई बार पुनर्मूल्यांकन में भी लापरवाही के चलते उनके अंको में सुधार नहीं होता फिर ऐसे में जिस द्वितीय वर्ष के होनहार विद्यार्थी जिसके अंक प्रथम वर्ष में मूल्यांकन संबंधी अनियमितताओं या निजी कारणों से कम रह गए थे उसको द्वितीय वर्ष के 50% अंक प्रथम वर्ष की मार्कशीट के आधार पर निर्धारित किए जाएंगे जो भारतीय संविधान के अनुसार किसी व्यक्ति को एक अपराध के लिए एक से अधिक बार दंडित नहीं किया जा सकता तो फिर यहां सिर्फ और सिर्फ विद्यार्थी से एक बार छोड़े गए प्रश्नों के अंक 2 बार कैसे छीने जा सकते हैं
  3) एक सर्वे के मुताबिक भारत में लगभग 10-15% विद्यार्थी यह चाहते हैं कि परीक्षाओं का आयोजन किया जाए हालांकि यह प्रतिशत शेष विद्यार्थियों की तुलना में काफी कम है लेकिन वर्ष पर्यंत मेहनत करने वाले विद्यार्थियों को निराशा तो नहीं प्रदान की जा सकती है। 
कुछ शिक्षक पात्रता परीक्षाओं में  स्नातक  की प्रतिशत का महत्व वर्तमान में है और भविष्य में भी किसी राज्य की सरकार ऐसे प्रावधान ला सकती है क्योंकि अगर ऐसे प्रावधान हटाए जाएंगे तो हो सकता है कि विद्यार्थी शिक्षक अपने प्रशिक्षण के प्रति लापरवाह हो जाए तो फिर क्या जिन विद्यार्थियों को आंतरिक मूल्यांकन के आधार पर खुशी खुशी से अच्छे अंक प्रदान किए जाएंगे की तुलना में भी विद्यार्थी जिन्होंने मेहनत करके भी अपेक्षाकृत कम अंक अर्जित किए थे के साथ यह अन्याय नहीं होगा? 
5) अक्सर अपनी जिंदगी के महत्व की दुआ देने वाले महाविद्यालय ी छात्रों को प्रमोट करने से पहले यह शर्त रखी जानी चाहिए कि जब तक देश में लॉकडाउन रहता है तब तक यदि उनमें से कोई भी कोरोना की गाइडलाइंस की अवहेलना करते हुए पुलिस के हाथ लगता है तो वह जुर्माना भरने को तैयार रहे क्योंकि आज वह अपने स्वास्थ्य एवं भविष्य को लेकर बहुत सतर्क हैं और ऐसी ही अपेक्षा  उनसे भविष्य में भी की जाती है। 

Friday, 19 June 2020

भारतीय जनता में आक्रोश: चीनी सामानों का बहिष्कार (#Boycott China)


नमस्कार दोस्तों
भारतीय जनता में आक्रोश: चीनी वस्तुओं का बहिष्कार


दुष्टों से हाथ मिलाना क्यों
सांपों को दूध पिलाना क्यों
जो फूलों से ईर्ष्यालु हैं,उनके संग कमल खिलाना क्यों
लेना-देना बन्द करें अब सेना के हत्यारों से
देशप्रेम का महत्व जानें,भारत माँ के प्यारों से
रक्षाबंधन पर राखी भी जो चीन बनाकर देता क्यों
मृदुता के त्योहार को नमकीन बनाकर देता क्यों
भारत की आंखों पर सुई की नोक चलाते फिरते हैं
मानसिक गुलाम लोग टिक-टॅाक चलाते फिरते हैं
दुनिया से जंग जीतनी है तो आपस में मत हारो तुम
अंधानुकरण छोड़ो और यह चीनी चोला उतारो तुम
अमर रहे यह वतन हमारा,सबको शान से गाना है
तड़क-भड़क की होली जलाकर स्वदेशी अपनाना है
पत्थरबाजी आगे की तो हम भी समर जोड़ देंगे
दो टूक सुन ले तेरी आर्थिक कमर तोड़ देंगे
चीनी सामानों का अब करना है हमको बहिष्करण
मन से कचरा निकालकर करना है हमको परिष्करण
कफ़न रूप में पसन्द है हमको जाना तिरंगा वेश में
स्वदेशी से रह जाएगा देश का पैसा देश में
आस्तीन के सांप
को अब अच्छा सबक सिखाना है
रक्षा के प्रयोजन से एकीकृत होकर दिखाना है

Thursday, 18 June 2020

मौलिक अधिकारों को याद करने की ट्रिक (A trick to learn fundamental rights with related articles)

नमस्कार मित्रों
आज मैं भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों को याद करने के लिए एक मौलिक कविता लेकर प्रस्तुत हूँ,गौरतलब है कि राजनीतिक विज्ञान के इस खण्ड से हमेशा प्रश्न पूछे जाते रहें हैं
[ {संविधान भाग-3, अनुच्छेद 12-35}-अमेरिकी संविधान से लिए गए हैं ]
हमने सुना है विधि के समक्ष ,होते हैं समान सब  (Art. 14)
इसलिए महत्व नहीं रखते धर्म,लिंग,स्थान सब (Art. 15)
समान अवसर मिलेंगे सबको अब तो लोक नियोजन में (Art. 16)
अस्पृश्यता नहीं करेंगे किसी के घर पर भोजन में (Art. 17)
इन गुणों को मान लिया तो वह भारतीय संत है
इसी नाम पर उस मानव की उपाधियों का अंत है (Art. 18)
स्वतंत्रता के मामले में सबको काफी छूट है(Art. 19)
दोषसिद्धि से संरक्षण का 20-20 कूट है (Art. 20)
स्वतंत्रता मिल चुकी है सबको प्राण और देह की (Art. 21)
नि:शुल्क शिक्षा इसमें मिलेगी लद्दाख और लेह की (Art. 21A)
बिना कारण बताए तो फिर करता कोई बन्द नहीं
विदेशियों हेतु इसमें ऐसा कोई प्रबंध नहीं (Art. 22)
सन् 23 तक यह लक्ष्य है ना किसी का शोषण हो (Art. 23)
24 तक बच्चों का ना उद्योगों में कुपोषण हो (Art. 24)
कोई नहीं पाबंदी तुम तो किसी धर्म को मान लो (Art. 25)
धार्मिक प्रबंध के सारे सूत्र तुम जान लो (Art 26)
धर्म के प्रचार पर जो किसी तरह का कर नहीं (Art. 27)
राजकीय शिक्षण में फिर जो कोई धार्मिक (+उपदेश) सर नहीं (Art. 28)
अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का सदा संरक्षण हो  (Art. 29)
रुचि की वे(अल्पसंख्यक) शिक्षा देंगे जो मूल्यों का ना भक्षण हो (Art. 30)
भारत ऐसी धरती हमारी,हमको इससे प्यार है
अधिकार छीने तो कोई संवैधानिक उपचार है (Art. 32)

लगता है खिसियानी बिल्ली पिटने को अभिलाषी है @India-China war hindi poems

नमस्कार दोस्तों
15-16 जून को सीमा पर  चीन के पीठ पीछे वार से वीरगति को प्राप्त हुए माँ भारती के सपूतों को अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि के साथ हमारे पड़ोसी की गद्दारी का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत है -


शेरों के साहस आगे चमगादड़ चाल रुकेगी नहीं
यह भारत माँ की सेना है सुन लें हर हाल झुकेगी नहीं
वीरता के क्षेत्र में हम दुनिया से विशेष हैं
मरना भी मंजूर है यह भगत सिंह का देश है
मेरा अंतर्मन रोता है जब यूँ वह सैनिक मरता है
रणभूमि में लड़े पड़ोसी गद्दारी क्यों करता है
पाक को उकसाने में ये अब तक शकुनि बना रहा
वीरों की शहादत पर ये अब भी दीवाली मना रहा
तेरी बर्बरता भारत से आगे वहन नहीं होगी
बदला पत्थर से लेंगे तेरी ईंटें सहन नहीं होंगी
चोर चोर मौसेरे भाई,घाटी में शोर मचाते हैं
सोए शेरों पर वार करके मन में मोर नचाते है
परमाणु धमकी से सुन ना डरते भारतवासी है
यूँ  लगता खिसियानी बिल्ली पिटने को अभिलाषी है
कोरोना पर खूब फ़ज़ीहत अमेरिका ने की तेरी
भारत ने सोचा शांति नामसमझी ही निकलीं मेरी
विकास का यह अहं तेरा चूर-चूर हो जाएगा
दुनिया के डंडों से कोरिया कोसों दूर हो जाएगा
खूब तरक्की कर ली तेरा विनाशकाल अब चालू है
कोरोना से बता दिया तू जीवन का ईर्ष्यालु है

Monday, 15 June 2020

आत्महत्या (suicide)......

नमस्कार ब्लॉगर परिवार 

भोग विलासी दुनिया में मानव,मानव से दूर हुआ
वो बेबस दिल जो मरने को इतना भी क्यों मजबूर हुआ
आभासी दुनिया में ये सब झूठ परोसा जाता है
आत्महत्या करने पर जीवन को कोसा जाता है
घर के भेदी लंका ढ़हाते तब अंतर्मन रोता है
सोचो उस परिवार की,चिराग जो अपना खोता है
कहने को तो उसके परित: जनमानस का मेला था
दुनिया के संग रहकर भी,वह हुआ क्यों अकेला था 
आकर्षण को प्यार जो कहना धोखे का ही खेल है
ज़हर से डसने वालों का दुनिया में कैसा मेल है 
फेसबुक मित्र हैं लाखों जीवन में कोई एक नहीं
किस को बात बताता खुद की इरादे किसी के नेक नहीं
आवश्यकता महत्ती है अब कसरत की और ध्यान की
सबसे ज़्यादा जग को अब जरूरत है मनोविज्ञान की 
खिलता हुआ फूल था मानों एकदम गर्दन पटक गया
दुष्टों में विषाणु इतना वह फंदे से लटक गया
बाद में मतलब भी क्या जो साजिश का बर्तन फूट गया
काल्पनिक मुस्कान रह गई भाईचारा टूट गया
मानव का जीवन लेकर भी मानवता सब भूल गए
जीवन ऐसी बाधा क्या जो वो फांसी से झूल गए 

Monday, 8 June 2020

पश्चिम का अंधानुकरण : भारत पर संकट


नमस्कार मित्रों
आज विश्व की श्रेष्ठतम मान-मर्यादा युक्त संस्कृति वाला भारत देश पाश्चात्य का अंधानुकरण करके नैतिक रूप से आगे नहीं बढ़ रहा है इस पर हमारी स्वरचित कविता प्रस्तुत है -


संस्कृति और सभ्यता को कितना जल्दी भुला दिया
पाश्चात्य के चमचों ने भारत को नींद में सुला दिया
भारत के मूल्यों को तो वह अंधविश्वास बताती रही
पश्चिम की ये दीमक जो भारत दिन-दिन खाती रही
पश्चिम में दिखावट की जो संक्रामक खांसी है
मानों या ना मानों उनका जीवन भोग-विलासी है
खूब हुआ ये खेल तमाशा,अब भारत से बन्द करो
'काम'की कहानी पढ़ने वालों याद विवेकानन्द करो
अंग्रेजों ने मारा था जो कितना गहरा घाव था
भारत के आदिमानव में कितना कुछ सद्भाव था
मानसिक गुलामों तुमने पहना कैसा भेष है
यहां देशप्रेमी बनना होगा यह भगत सिंह का देश है
घर की मुर्गी दाल बराबर समझकर तुमने छोड़ दिया
मिली ज़रा सी आजादी अपनों से नाता तोड़ दिया
पढ़े लिखे गंवारों से तो बेहतर ही अशिक्षा थी
भूखे को भोजन मिलता था,भिक्षुक को मिलती भिक्षा थी
औरों को उपदेश दिया चलते ना अपने पैरों पर
अपनों से नफरत कितनी,विश्वास किया है गैरों पर
पाश्चात्य का भूत ये तो पूरी तरह से छाया है
भारत के मस्तक पर ये घोर संकट आया है
क्रिकेट के मैदान में फुटबॅाल की रीति कैसे चले
भारत शिक्षा में फिर पश्चिम की नीति कैसे चले


स्वदेशी अपनाइये


जय हिंद जय भारत

Saturday, 6 June 2020

माफ करो नेताजी,उज्ज्वल वस्त्र भी शर्मिंदा हैं .....


नमस्कार मित्रों
आप सभी के कुशल होने की उम्मीद के साथ आज चुनावों से पहले के समय चलने वाली आरोप-प्रत्यारोप की श्रृंखला पर हमारी स्वरचित कविता प्रस्तुत है -

पांच साल अब बीत गए जो हुआ ये प्रत्यावर्तन है
एक दूसरे की बातों का जुबान से ये कर्तन है
कहते हैं हम हरीशचन्द्र,हम ही तो सत्यवान हुए
सत्ता के गलियारों के अब सक्रिय जो कान हुए
शासक और शोषक सब गिरगिट से रंग बदलने लगे
नेताजी के चमचे भी अब घर से निकलकर चलने लगे
यूँ करते हैं याचना कि देश बचाना चाहते हैं
हम सेवक,जनता ईश्वर,बैकुंठ में जाना चाहते हैं
समझदार तो समझ गया कि मिथ्याभाषी जिंदा है
माफ करो नेताजी,उज्ज्वल वस्त्र भी शर्मिंदा हैं
कोयल सी कोमलता से ये ज़हर के जैसा बोलते
सदगुण की प्रशंसा नहीं और पोल हमेशा खोलते
मोल मतों का करके सबने पल्लू झाड़ लिया है अब
पांच साल अपना घर भर लिया,छप्पर फाड़ दिया है अब
फेसबुक के योद्धा भी अब उतर समर में आये हैं
मुफ्त की ठंडी चाय (शराब) ने वाणी के तीर चलाए हैं
गरीब बाप के पैसों का बेटा-बेटी ही काल बने
शिक्षा-दीक्षा को भूलकर नेताजी के दलाल बने
जनता को भड़काकर फिर आपस में उड़ाते खिल्ली  हैं
यूँ लड़ते हैं बार-बार जैसे लड़ते कुत्ते बिल्ली हैं
सच तो यह है लूटपाट के अलग-अलग इरादे हैं
कर्णधार इस देश के क्यों करते झूठे वादे हैं ?