नमस्कार ब्लॉगर परिवार
भोग विलासी दुनिया में मानव,मानव से दूर हुआ
वो बेबस दिल जो मरने को इतना भी क्यों मजबूर हुआ
आभासी दुनिया में ये सब झूठ परोसा जाता है
आत्महत्या करने पर जीवन को कोसा जाता है
घर के भेदी लंका ढ़हाते तब अंतर्मन रोता है
सोचो उस परिवार की,चिराग जो अपना खोता है
कहने को तो उसके परित: जनमानस का मेला था
दुनिया के संग रहकर भी,वह हुआ क्यों अकेला था
आकर्षण को प्यार जो कहना धोखे का ही खेल है
ज़हर से डसने वालों का दुनिया में कैसा मेल है
फेसबुक मित्र हैं लाखों जीवन में कोई एक नहीं
किस को बात बताता खुद की इरादे किसी के नेक नहीं
आवश्यकता महत्ती है अब कसरत की और ध्यान की
सबसे ज़्यादा जग को अब जरूरत है मनोविज्ञान की
खिलता हुआ फूल था मानों एकदम गर्दन पटक गया
दुष्टों में विषाणु इतना वह फंदे से लटक गया
बाद में मतलब भी क्या जो साजिश का बर्तन फूट गया
काल्पनिक मुस्कान रह गई भाईचारा टूट गया
मानव का जीवन लेकर भी मानवता सब भूल गए
जीवन ऐसी बाधा क्या जो वो फांसी से झूल गए